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आज स्वतंत्र भारत के नागरिकों को जिन्हें आजाद और खुली हवा में सांस लेने का महती सुअवसर प्राप्त हुआ ‘है। इन सबके मूल में परतंत्र और घुटन भंरी हवा के साये तले देश की आजादी के दीवानों की ऐसी बलिदान गाथा रही है, जो अनंतकाल तक अविस्मरणीय और प्रेरणा स्त्रोत बनी रहेगी। देश के लिये हँसते-हंसते अपनी जान कुर्बान करने वालों की अमर गाथाएँ हमें आजीवन हर क्षण, हर पल यह याद दिलाती रहती है कि हमारी आजादी कितनी महंगी रही है। जिसके एवज में हमें कितनी ही जानों की आहूतियों देनी पड़ी है। ऐसे ही एक अमर शहीद “हेमुकालानी” भी हुये हैं। जिनकी कुर्बानी ये देश हमेशा याद करेगा।
देश को आजाद कराने विशाल सागर रुपी कार्य के लिये शहीद हेमु कालीन जैसे बूंदों से ही यह महान कार्य संभव हो सका था, सर्वविदित है कि बूंद बूंद से ही सागर का निर्माण हो सकता है। स्वतंत्रता पूर्व देश को आंजाद कराने वाले सपूतों में प्रमुख रुप से दो प्रकार की धारायें प्रचलित थी। जिसमें एक उग्र तथा दूसरा उदार अहिंसावादी धारा के लोग थे।

इस धारा के अनुयायियों में स्वतंत्रता प्राप्ति के लिये किसी भी प्रकार के हिंसात्मक कार्यों का पूर्णरुपेण वर्जन किया गया था। इस धारा में महात्मा गाँधी, जवाहर लाल नेहरु, मोती लाल नेहरु, बाल गंगाधर, लाजपतराय, बल्लभ भाई इत्यादि विभूतियाँ प्रमुख रुप से सक्रिय थीं। इसी तरह उग्रवादी पंथ अपना कार्य किये जा रहा था। इस धारा के लोगों का मत था कि जालिमों के साथ जालिम का ही व्यवहार किया जावे। वैसे इस धारा को गलत भी नहीं माना जा रहा था, लेकिन उदारवादी धारा द्वारा ‘इस धारा का प्रतिरोध किया जाता रहा। उग्रधारा में प्रमुख रुप से शामिल क्रांतिकारी चंद्रशेखर आजाद, भगतसिंह, सुभाष चंद्र बोस, विमल चटर्जी, बिस्मिल, हेमूकालानी, जगदेव आदि प्रमुख रुप से शामिल थे।
हेमू कालानी और भगत सिंह किशोरावस्था से ही स्वतंत्रता के महायज्ञ में कूद पड़े थे, और जीवन के अंत तक दोनों का साथ बराबर वना रहा था। इसीलिये इनकी जोड़ी को अक्सर गुरु चेला की उपाधि से पुकारा जाता था। वैसे ये लोग उदारवादी धारा को आदर की दृष्टि से ही देखते थे। तथापि मत भिन्नता कायम थी। अधिकांशतः तो इस मत के प्रमुख अनुयायी महात्मा गाँधी की प्रेरणा से ही इस महा समर में कूद पड़े थे। हेमू कालानी भी उनमें से एक थे।
वैसे हेमु कालानी का जीवन अत्यल्प ही रहा, उनके गुरु भगत सिंह युवावस्था में ही कूर ब्रिटिश सरकार द्वाग फांसी में चढ़ा दिये गये थे। ठीक उसी तरह कालानी को भी फाँसी का हुकुम सुनाया गया, जिसे वे हँसते हँसते फूलों की हार की तरह फांसी के फंदे को वरण कर भारत की स्वतंत्रता इतिहास में स्वर्णाक्षरों में प्रभामंडित हुये। उनका यह उदाहरण हमें युगों युगों तक प्रेरणा प्रदान करता रहेगा। कालानी अति उत्साही प्रवृत्ति के युवा क्रांतिकारी रहे है। देश की आजादी के लिये तीव्र तथा ज्यादा उत्कंठित और अधीर हो जाया करते थे।
जैसे एक बार ब्रिटिश सरकार के विराध स्वरुप रेल की पांते उखाडने वाली टीम में शामिल होने जिद करने लगे, उस आने वाली रेल जिसमें क्रांतिकारियों को कुचलने और देश की गुलाम निरीह जनता के ऊपर अत्याचार के लिये हथियार बारुद अंग्रेज सरकार द्वारा मंगाया जा रहा था। ये बात कालानी और उनके साथियों को बुरी लगी, तब इन लोगों ने ठान लिया कि आने वाली रेल में रखे बारुद, बंदूकों के जखीरे का अंग्रेज सरकार के हाथों में नहीं पड़ने देंगे । भले ही इसके लिये कितने ही अंग्रेज अफसरों को मारना पड़े। इसके लिये संगठन में तैयारियाँ होने लगी। कमांडर भगत सिंह से हेमु प्रार्थना करने लगे कि इस कार्य को अंजाम देने के लिये मुझे चुना जाये। संगठन के बुजुर्ग लोगों का मत था कि हेमू अभी बहुत छोटा है वह इस खतरनाक काम को ठीक तरह से नही कर पायेंगा, तब उसे न भेजने को मन बना लिया गया, लेकिन भगत पर हेमू के मिन्नतों का प्रभाव पड़ा और उसे कार्य दलें में शामिल कर लिया गया।
जब हेमू का दल अपने निर्धारित स्थान पर पहुंचा जहां जंगलों के बीच से गुजरती रेलवे लाइने बिछी थी, वही स्थान चुना था उन रणबांकुरों ने अपनी भारत माता की दासता की जंजीरों को काट फेंकने के लिये। इनकी योजना थी कि रेल को यहीं पर गिराया जावेगा, और जैसे ही हेमू ने साथियों सहित रेलवे लाइन की फिश प्लेटें उखाड़ना शुरू किया था कि वहाँ तैनात संतरियों ने प्लेटें उखड़ने की आवाज सुनकर अपने आला अफसरों सहित उन सभी को चारों तरफ से घेर लिया। लेकिन धन्य हो हेमू जिसने अदम्य साहस के साथ अपने सभी साथियों को सुरक्षित उनके घेरे से बाहर निकालने में महत्वपूर्ण कार्य का निर्वहन किया।
अंत में स्वयं “इंकलाब जिंदाबाद”, “भारतमाता की जय” का सिंहनाद करते हुये सहर्ष हथकड़ियो को मुस्कुराकर पहन लिया। इसे देखकर अंग्रेज एकदम अचंभित रह गये। बाद में हेमू पर जेल में घोर अत्याचार और यातनाओं का रोंगटे खड़े कर देने वाला दौर गुजरा, फिर भी अंग्रेज उनसे कुछ भी न उगलवा सके, सिर्फ उस तरुण के मुँह में एक ही लफ्ज निकला करती थी “इंकलाब जिंदाबाद”, “भारतमाता की जय”। थकहार कर आखिर उन अत्याचारियों ने उन्हें इक्कीस जनवरी’ 1943 को फाँसी दे दिया।
उसे फिक्र है नई तर्जे जफा क्या है।।
‘हमें महज वह शौक है,
देखें सितम की इंतहा क्या है।।”
- सुरेश सिंह बैस" शाश्वत"
