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दर्जन भर से ज्यादा जिन स्कूल भवनों को नक्सलियों ने आज से 10 से 15 साल पहले आईईडी ब्लास्ट कर उड़ा दिया था उन स्कूल भवनों का पुनर्निर्माण अब वही नक्सली कर रहे है. ये नक्सली आत्मसमर्पित है और हिंसा का रास्ता छोड़कर समाज की मुख्यधारा से जुड़ चुके है. नक्सलियों के हृदय परिवर्तन की ये पूरी कहानी धुर नक्सल प्रभावित इलाका दंतेवाड़ा जिले के भैरमगढ़ का है. ये सभी तहस नहस किये गए स्कूल मालंगिर और कटेकल्याण के उन सुदूर इलाको में मौजूद थ्व जहां कभी सिर्फ नक्सलियों की हुकूमत चलती थी. फिलहाल जिस स्कूल का निर्माण कराया जा रहा है वह भांसी मलप्पा में मौजूद है. यह गांव जिला मुख्यालय से 20 किलोमीटर दूर है. यह पूरा निर्माण आत्मसमर्पित नक्सली स्थानीय ग्रामीणों की मदद से कर रहे.

गांव के सरपंच अजय तेलाम का कहना है की स्कूलों को सन 2012 में नक्सल समर्थकों और नक्सलवादियों ने मिलकर तबाह कर दिया था. यह पूरी घटना सलवा जुडूम के बाद सामने आई थी. लेकिन अब हालात बदल चुके हैं ग्रामीण अपने बच्चों की अच्छी परवरिश चाहते हैं. जबकि बच्चे भी फिर से स्कूल में लौट कर अपना बेहतर कैरियर बनाना चाहते हैं. उनके बच्चे उच्च शिक्षा की ख्वाहिश रखते हैं.

जिले के पुलिस सुपरिटेंडेंट अभिषेक पल्लव ने बताया कि भांसी की तरह ही जिन गांव में स्कूलों का पुनरुद्धार किया जा रहा है उनमें पोटली, बरगम, नहरी कोटरेम और अलनार गांव शामिल हैं. यह सभी धुर नक्सल क्षेत्र में मौजूद हैं लेकिन अब सरेंडर कर चुके नक्सली ग्रामीणों की मदद से इन स्कूलों को फिर से बनाने का बीड़ा उठा चुके हैं. आत्मसमर्पित नक्सलियों ने खुद ही पूरे निर्माण की जिम्मेदारी ली है. उनका कहना है कि स्कूल का निर्माण पूरा होते ही वे इसे स्थानीय प्रशासन को सौंप देंगे. उन्होंने यह भी बताया कि इन स्कूलों के निर्माण में जुटे नक्सली और ग्रामीण किसी भी तरह की सुरक्षा नहीं चाहते बावजूद पुलिस को यह डर बना हुआ है कि बड़े नक्सली नेता उन पर हमला ना कर दे लिहाजा उन्हें पूरी सुरक्षा भी मुहैया कराई जा रही है.

दंतेवाड़ा इलाके में सोशल एक्टिविस्ट के तौर पर काम करने वाले लोगों का भी यही कहना है कि गांव वाले इन स्कूलों को जल्द ही फिर से शुरू करना चाहते हैं. सलवा जुडूम के बाद जो तबाही का मंजर यहां देखने को मिला है इस बीच फिर से स्कूलों का बनना एक उम्मीद की नई किरण लेकर आया है. गांव वाले अपने बच्चों की शिक्षा को लेकर बेहद उत्साहित हैं. वे चाहते हैं कि उनके बच्चे भी गुमनाम जंगलो में ना खो जाए बल्कि बड़े शहरों में जाकर कुछ अच्छा करें और इलाके का नाम रोशन करें. अब तक जिस दंतेवाड़ा को नक्सल क्षेत्र के नाम से जाना जाता था वे चाहते हैं कि यह बदनुमा दाग हट जाए और दंतेवाड़ा जैसा धुर नक्सल प्रभावित इलाका नई पहचान की वजह से जाना जाए.