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गुरु पूर्णिमा एक महत्वपूर्ण गुरु पूर्णिमा हिन्दू धर्म, बौद्ध धर्म और जैन धर्म में अत्यंत पावन पर्व माना जाता है। यह आषाढ़ मास की पूर्णिमा को मनाया जाता है और गुरु के प्रति श्रद्धा, सम्मान और कृतज्ञता प्रकट करने का दिन होता है।गुरु पूर्णिमा ज्ञान और शिक्षा के महत्व को भी दर्शाता है। यह त्योहार हमें ज्ञान प्राप्त करने और शिक्षा के माध्यम से अपने जीवन को बेहतर बनाने के लिए प्रेरित करता है। गुरु पूर्णिमा आध्यात्मिक विकास के लिए भी महत्वपूर्ण है। यह त्योहार हमें आध्यात्मिक ज्ञान प्राप्त करने और अपने आत्मा को शुद्ध करने के लिए प्रेरित करता है। इसके पीछे कई पौराणिक कथाएँ प्रचलित हैं, जिनमें प्रमुख निम्नलिखित हैं:

गुरु पूर्णिमा की कथा महाभारत काल से भी जुड़ी हुई है। कथा के अनुसार, महाभारत के युद्ध में भगवान कृष्ण ने अर्जुन को गुरु के महत्व के बारे में बताया था। भगवान कृष्ण ने अर्जुन को समझाया कि गुरु की कृपा से ही हम ज्ञान और शक्ति प्राप्त कर सकते हैं। इसके अलावा गुरु पूर्णिमा से संबंधित और भी कथाएं हैं जैसे-1. महर्षि वेदव्यास की कथा (सबसे प्रमुख कथा)

गुरु पूर्णिमा को व्यास पूर्णिमा भी कहा जाता है, क्योंकि इसी दिन महर्षि वेदव्यास का जन्म हुआ था। वेदव्यास ने वेदों का विभाजन किया और उन्हें चार भागों में व्यवस्थित किया- ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद, और अथर्ववेद। इसके अलावा, उन्होंने महाभारत की रचना की और 18 पुराणों की रचना भी की।इस कारण वेदव्यास को “आदि गुरु” माना जाता है और उनकी स्मृति में ही गुरु पूर्णिमा का पर्व मनाया जाता है। इस दिन शिष्य अपने गुरु का पूजन कर उनसे ज्ञान की प्राप्ति के लिए आशीर्वाद मांगते हैं।2. भगवान शिव – आदि गुरु की कथा

हिन्दू शैव परंपरा के अनुसार, भगवान शिव को प्रथम गुरु (आदि गुरु) माना गया है। शिव ने सबसे पहले सप्तर्षियों (सात ऋषियों) को योग और ध्यान का ज्ञान दिया। ये सप्तर्षि बाद में पूरे विश्व में ज्ञान और योग का प्रचार करने निकले। इस ज्ञान देने की प्रक्रिया की शुरुआत भी आषाढ़ की पूर्णिमा से हुई, इसलिए यह दिन गुरु पूर्णिमा कहलाया।3. भगवान बुद्ध की कथा (बौद्ध परंपरा)

बौद्ध धर्म में भी गुरु पूर्णिमा का विशेष महत्व है। मान्यता है कि भगवान गौतम बुद्ध ने बोधगया में ज्ञान प्राप्ति के बाद अपने पहले पाँच शिष्यों को सारनाथ (वाराणसी के पास) में धम्म का पहला उपदेश (धर्मचक्र प्रवर्तन) इसी दिन दिया था। यह उपदेश गुरु पूर्णिमा के दिन हुआ था, इसलिएश्र बौद्ध अनुयायी इसे ‘धम्म चक्र प्रवर्तन दिवस’ के रूप में मनाते हैं।4. जैन परंपरा में गुरु पूर्णिमा

जैन धर्म में भी इस दिन का महत्व है। मान्यता है कि भगवान महावीर के प्रथम शिष्य गौतम गणधर को इसी दिन कैवल्य ज्ञान प्राप्त हुआ था और वे गणधर (आचार्य) बने। इसीलिए गुरु पूर्णिमा जैन समुदाय में भी ‘गुरु-वंदन’ के रूप में मनाई जाती है।

गुरु पूर्णिमा के दिन निम्न कार्य किए जाने चाहिए।1. गुरु का सम्मान: गुरु पूर्णिमा के दिन अपने गुरु का सम्मान और आदर करें। उन्हें फूल, फल और अन्य उपहार दें।2.पूजा और आरती:गुरु पूर्णिमा के दिन अपने गुरु की पूजा और आरती करें।3.ज्ञान और शिक्षा: गुरु पूर्णिमा के दिन ज्ञान और शिक्षा के महत्व को समझें और अपने जीवन में इसका पालन करें। 4.आध्यात्मिक विकास: गुरु पूर्णिमा के दिन आध्यात्मिक विकास के लिए समय निकालें और अपने आत्मा को शुद्ध करने के लिए प्रयास करें।गुरु पूर्णिमा का एक शिष्य के लिए बहुत महत्व है, क्योंकि यह दिन गुरु-शिष्य परंपरा के महत्व को दर्शाता है।

कुछ महत्वपूर्ण बातें हैं जो गुरु पूर्णिमा के दिन एक शिष्य के लिए महत्वपूर्ण हैं।गुरु पूर्णिमा के दिन, एक शिष्य अपने गुरु के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करता है। वह अपने गुरु को धन्यवाद देता है जिन्होंने उसे ज्ञान, मार्गदर्शन और समर्थन प्रदान किया है।इस दिवस को एक शिष्य अपने गुरु का सम्मान और आदर करता है। वह अपने गुरु को फूल, फल और अन्य उपहार देता है, और उनकी पूजा और आरती करता है।

गुरु पूर्णिमा के दिन, एक शिष्य ज्ञान और शिक्षा के महत्व को समझता है। वह अपने गुरु से सीखने के लिए प्रेरित होता है और अपने जीवन में ज्ञान और शिक्षा का पालन करता है।गुरु पूर्णिमा के ही दिन, एक शिष्य आध्यात्मिक विकास के लिए समय निकालता है। वह अपने गुरु से आध्यात्मिक मार्गदर्शन प्राप्त करता है और अपने आत्मा को शुद्ध करने के लिए प्रयास करता है।गुरु पूर्णिमा के दिन, एक शिष्य गुरु-शिष्य परंपरा के महत्व को समझता है। वह अपने गुरु के साथ अपने संबंधों को मजबूत बनाने के लिए प्रयास करता है और गुरु-शिष्य परंपरा को आगे बढ़ाने में अपना योगदान देता है। अंततः गुरु पूर्णिमा न केवल एक पर्व है, बल्कि ज्ञान, विनम्रता और कृतज्ञता का प्रतीक है। यह हमें यह स्मरण कराता है कि जीवन में सच्चे मार्गदर्शक (गुरु) का स्थान अत्यंत उच्च है और उनके बिना आत्मज्ञान या मुक्ति संभव नहीं है। त्योहार है, या की यह भी कह सकते हैं कि एक शिष्य के लिए गुरु के प्रति आस्था और सम्मान प्रकट करने का एक महत्वपूर्ण दिवस गुरु पूर्णिमा ही है, जो गुरुओं के सम्मान और आदर के लिए मनाया जाता है। यह त्योहार आमतौर पर जुलाई के महीने में मनाया जाता है, जब पूर्णिमा का दिन पड़ता है। गुरु पूर्णिमा का मुख्य उद्देश्य गुरुओं का सम्मान और आदर करना है। यह त्योहार गुरुओं के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने का अवसर प्रदान करता है। गुरु चरणों में सदा वंदन, आप ही ज्ञान दीप का स्रोत। अंधकार में गुरु दिखाते राह, बनें जीवन के पथप्रदर्शक स्वोत।शब्दों में नहीं समा सकते , है उनका अनंत उपकार। हे इश्वरतुल गुरुवर!आप हीहो जीवन का सच्चा आधार ।। – सुरेश सिंह बैस “शाश्वत” बिलासपुर छत्तीसगढ़